Heart to Heart

अंतर का प्रकाश

English

Once someone asked Maharaj Ji to speak about his family and particularly his father, since not only was he Maharaj Ji’s father but also the son of Great Master. Maharaj Ji commented: “What is there to know?” and went on to explain that biological details were relevant only for generals and politicians: the saint’s biography, he said, lies in their sangat and in their teachings, reflected through the sangat.
Legacy of Love

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Many hundreds of stories are told about the abounding love and spiritual achievement of Baba Sawan Singh. One story concerns a visiting stranger. This man had quietly listened to the Master’s teaching at satsang, but after a while he rose and interrupted the discourse, saying that he did not believe that the speaker was a true Guru and implying that he was an impostor.

The astonished disciples became angry and were about to throw him out, whereupon Maharaj Ji quieted them with a gesture of restraint, saying, “Why are you angry with this man? He is entitled to his opinion and I am not angry, so why should you be?”

Thereupon the stranger threw himself at the Master’s feet and confessed: “I have been travelling for many years in search of a Satguru. I have tried this harsh trick upon many who claimed to be true saints, and they have always been very angry. Each time I have thought, ‘so you have not yet overcome the five enemies, of which anger is one, and are therefore no master of yourself.’ And I have gone away knowing that I have yet to find a true Master. Only now have I found one who is without anger or bitterness. I have at last found a true saint.”
The Mystic Philosophy of Sant Mat

हिंदी

एक दिन सूर्य और गुफ़ा में बातचीत हुई। दोनों ने एक-दूसरे से ख़ैरियत पूछी और अपने रोज़मर्रा के जीवन के बारे में बातचीत की। सूर्य अंधकार के मायने नहीं समझ पा रहा था जबकि गुफा प्रकाश के अर्थ को नहीं समझ पा रही थी। उन्होंने कुछ पलों के लिए एक-दूसरे के जीवन में झाँकने का फ़ैसला किया। जब गुफा ने सूर्य के प्रकाश को देखा तो वह प्रकाश को देखकर मंत्रमुग्ध हो गई; सूर्य के तेज प्रकाश में वह हर चीज़ को देख सकती थी। गुफा ने माना कि सूर्य का प्रकाश इतना अद्भुत था कि वह वर्णन से परे था। हालाँकि जब सूर्य गुफा में गया तो उसे कुछ भी फ़र्क़ नज़र नहीं आया। सूर्य और गुफा दोनों ही इस बात से हैरान थे। गुफा ने पाया कि सूर्य के प्रकाशमय संसार और उसके अंधेरे संसार में उल्लेखनीय अंतर था। हालाँकि सूर्य का मानना यह था कि दोनों के संसार एक जैसे दिखते हैं।

सूर्य को अंतर क्यों नहीं दिखाई दिया? जब सूर्य गुफा में गया, वह अपना प्रकाश साथ ले गया और गुफा के अंधेरे से अंधेरे कोने भी रोशन हो गए। सूर्य को तो केवल प्रकाश के बारे में ही पता था। इसी तरह, एक आत्म-ज्ञानी को कभी भी अँधकार में नहीं धकेला जा सकता क्योंकि उसका प्रकाश सदा उसके साथ ही रहता है। अगर किसी के अंदर अंधकार यानी नकारात्मकता, भय व संदेह है तो वह अनजाने में गुफा की तरह बन जाता है। लेकिन अगर कोई सूर्य की तरह प्रकाशवान है तो किसी भी तरह का अंधकार उसे प्रभावित नहीं कर पाता क्योंकि उसके पास प्रकाश है जिसमें अंधकार रह ही नहीं सकता।

हम सूर्य की तरह कैसे बनें? हम जहाँ भी जाएँ, वहाँ प्रकाश कैसे फैलाएँ? हमें यह प्रकाश कहाँ से मिलेगा? कहानी में गुफा और सूर्य मनुष्य की मानसिकता के प्रतीक हैं और जब हम अपने रूहानी सफ़र पर निकल पड़ते हैं तो धीरे-धीरे हम अँधेरे को प्रकाश में बदल सकते हैं। यह सफ़र उस दिव्य प्रकाश की खोज के लिए है जो हमारे भीतर मौजूद है जो हमारी हस्ती का सार है।

संत-महात्मा प्रकाश के पुंज होते हैं जो इस प्रकाश का अनुभव करने में हमारी मदद करते हैं। परमात्मा संत-महात्माओं को मनुष्य के रूप में भेजता है बिलकुल उसी तरह जिस तरह सूर्य अपनी किरणों को भेजता है। किरणें सूर्य से अलग नहीं होतीं; सूर्य की वजह से ही इनका अस्तित्व होता है और इनमें सूर्य जैसी ख़ूबियाँ होती हैं। जब सूर्य अस्त होता है तब वे किरणें सूर्य में समाकर सूर्य ही बन जाती हैं। किरणें सदा सूर्य से जुड़ी रहती हैं और सूर्य से दूर होने पर भी इनके गुण समान होते हैं – ये सदा सूर्य का हिस्सा होती हैं। इसी तरह, सतगुरु इंसान के रूप में हमारे स्तर पर आकर हमसे नाता जोड़ते हैं; वे स्वयं सत्य का निजी अनुभव कर चुके होते हैं और हमें मार्ग दिखा सकते हैं। वह निराकार परमात्मा स्वयं मनुष्य का रूप धारण करता है।

मैं जगत् की ज्योति हूँ। जो मेरे पीछे-पीछे आएगा, वह अंधकार में नहीं चलेगा बल्कि जीवन की ज्योति पाएगा।
बाइबल, जॉन 8:12

हर का सेवक सो हर जेहा॥ भेद न जाणहो माणस देहा॥
गुरु नानक देव जी, प्रकाश की खोज

हज़रत ईसा भी इसी सत्य की पुष्टि करते हैं, जब वह फ़रमाते हैं:

मेरा विश्वास करो कि मैं परमपिता में हूँ, और परमपिता मुझमें है: नहीं तो मेरे इन कामों के कारण ही मेरा विश्वास करो।
बाइबल, जॉन 14:11

एक बार जब हमारा मिलाप पूर्ण संत-सतगुरु से हो जाता है जिन्होंने स्वयं आत्म-साक्षात्कार कर लिया है तब हमारा अपने आंतरिक प्रकाश की खोज का सफ़र शुरू हो जाता है। तब हम अपनी अज्ञानता के अंधकार को पीछे छोड़कर आंतरिक प्रकाश के क़रीब पहुँच सकते हैं जैसे कि ऊपर दी गई कहानी में बताया गया है। पूर्ण संत-सतगुरु ही हमें आंतरिक प्रकाश का नूरानी मार्ग दिखाते हैं और हमें शब्द या नाम के मार्ग का भेद बताते हैं।

पूर्ण संत-सतगुरु की दया-मेहर से जब जीव उस शब्द के साथ जुड़ जाता है तब उसकी आंतरिक आँखें खुल जाती हैं, उसकी आत्मा का अंधापन दूर हो जाता है। उसके अंदर इलाही नूर प्रकट हो जाता है और अज्ञानता का अंधकार दूर हो जाता है।

अंतर चानण अगिआन अंधेर गवाइआ॥
गुरु नानक देव जी, प्रकाश की खोज

इस आंतरिक प्रकाश का वर्णन करते हुए हज़रत ईसा ने फ़रमाया है:

शरीर का प्रकाश आँख है, इसलिए अगर तुम एक आँख वाले हो जाओ तो तुम्हारा सारा शरीर प्रकाशमय हो जाएगा।
बाइबल, मैथ्यू 6:22

नामदान के समय हमें अंतर में दिव्य प्रकाश को देखने और आवाज़ को सुनने की युक्ति समझाई जाती है। हमारी आत्मा उसी दिव्य शब्द या नाम का रूप है जो हमारे रोम-रोम में समाया हुआ है। हम इस रूहानी सत्य का अनुभव तभी कर सकते हैं जब हम भजन-सिमरन करके सतगुरु की दया-मेहर द्वारा शब्द या नाम में अभेद हो जाते हैं।

उलटा कूवा गगन में तिस में जरै चिराग॥
तिस में जरै चिराग बिना रोगन बिन बाती।
छ: रितु बारह मास रहत जरतै दिन राती॥
सतगुरु मिला जो होय ताहि की नजर में आवै।
बिना सतगुरु कोउ होय, नहीं वा को दरसावै॥
पलटू साहिब

चाहे वह दिव्य प्रकाश सदा हमारे भीतर जगमगा रहा है मगर सच्चे संत-सतगुरु के बिना हम अज्ञानता के घोर अंधकार में ही खोए रहेंगे। सतगुरु के बिना न तो प्रकाश दिखाई देता है, न ही मुक्ति मिल पाती है। सतगुरु शिष्य और मुक्ति के बीच की अहम कड़ी हैं।